Monday, 17 March 2014

विरही राधा की अरदास

मथुरा में बसकर नंद नंदन ,                     
            तुम राधा को क्यों भूल गए |
कुबजा के संग खेली होली , 
            सखियों को रंगना भूल गए ||
जमुना तट पर खड़ी विरही ,
             तेरी  बाट निहार रही |
आएँगे  प्रियतम मेरे , 
             मन में यही विचार रही  || 
झूमेंगी गोकुल की गलियाँ ,
            नव पल्लव की हरियाली में |
गऊओं की रम्भार कहेगी ,
            बीतेंगे दिन खुशहाली में ||
ग्वालों की निकलेगी टोली ,
            लेकर रंग भरी पिचकारी |
छूटेंगी न एको सखियाँ ,
              गोरी , साँवली या कली ||
भावों का अम्बार सजा है ,
               रस्ता देख रही राधा प्यारी |
सावन बीता आया फागुन , 
                अब तो आ जाओ गिरधारी ||