मलय समीरा मौसम
आदमखोर दिखाई देता है |
' विश्व शांति ' का नारा ,
कमज़ोर दिखाई देता है ||
धर्म - धर्म से टकराता है ,
सीमा - सीमा को बेध रही |
आततायी शक्तियाँ एकजुट हो ,
मानवता को है छेद रही ||
कहीं बमों का धुआँ उठे ,
कहीं छुरी तलवार चले |
रक्त रंजित हुई धरा ,
पग - पग पर आतंक मचे ||
धरती के एक अभीष्ट टुकड़े ने ,
तालिबान का निर्माण किया |
कौमी गद्दी की जिज्ञासा ने ,
आतंकी लिट्टे को जन्म दिया ||
दिल दहलाती हैं करतूतें
हिंसा करने वालों की |
आँखों में आँसू लाती है ,
हालत मरने वालों की ||
अब तो हिंसा ,
मानवता से टकराती है |
' विश्व शांति ' का उपहास ,
क्षण - क्षण वो करवाती है ||
हमने सालों - साल खो दिए,
श्वेत कपोत उड़ाने में |
' विश्व शांति ' का परचम ले ,
इस जग को समझाने में ||
पर , अहंकार की मरुभूमि ,
प्रेम - पुष्प न खिलने देती |
आरोपों - प्रत्यारोपों की डोरी ,
बंधुत्व को न बँधने देती ||
जन - जन की अभिक्षिप्त वाणी ,
आह्वान करती मानवता का |
शांति बीज के बोने वालों ,
अब समय नहीं है सोने का ||
अब , इन कोहराम भरी रातों का
ढलना ज़रूरी है |
घोर तिमिर में एकता की मशाल का
जलना ज़रूरी है ||
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