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मासूम दिल |
बस एक ही आस थी ,
कि मिल जाए सुकूँ इस दिल को |
पर ज़ालिम दुनिया की ,
बेतरतीबी ने दिया असुकूँ इस दिल को ||
जब - जब दया की दी दुहाई ,
तब - तब उसकी बेरुखी नज़र आई |
बाहों को फैला जो किया क्रंदन ,
तो उसने तिरस्कार की नीति अपनाई ||
जितनी हमदर्दी दिखाई हमने ,
उतना ही बेदर्द होता गया ज़माना |
बेरुखी ने जब अपना ज़ोर चलाया ,
तो ज़माने को तनिक होश आया |
लेकर अपनी आगोश में हमें सहलाया ,
अपनेपन की डोर से बाँध मुस्काया ||
अपनी भी आदत नहीं थी बेरुखी की ,
सो उसकी इस अदा पर हमें प्यार आया |
असुकूँ की गिरफ्त से निकलकर ,
सुकूँ को अपना हमदम बनाया ||